Sunday, December 27, 2009

दिल ढूंढता है कोई कारवाँ ।

मसलहत चाहती है कि मंज़िल मिले,
और दिल ढूंढता है कोई कारवाँ । मसलहत = समझदारी

सुबह के सात बजे हैं, अभी- अभी बालकनी से लौटा हूँ। दिल्ली की ये सुबह बहुत कुछ जिन्दगी जैसी जान पड़ी। धुन्ध से लिपटी हुयी। जरा कुछ दूर क्या है, मजाल क्या कि जरा भी कुछ खबर मिल जाए। पूरी रात लाख करवटें बदलता रहा पर नींद को नहीं आना था सो नहीं आयी। अब जब कि वापसी तय हो चुकी है तो दिल को दिलासे देता रहा, सब ठीक कर लूँगा। दो दिन पहले किसी ने मुझे पलायनवादी ( Escapist ) कहा। कहा गया कि जरा सी मुश्किल पड़ने पर मैं भाग रहा हूँ। मैंने संघर्ष किये बिना ही हार मान ली है, आदि आदि। सोचता हूँ सच कितना है। फेसबुक पर एक सवाल उठाया था – क्या मुझे, वही नहीं मिल रहा, जो मैं पाना चाहता हूँ ? लोगों ने मुझे धैर्य रखने की सलाह दी, जोश दिलाया, पर जो सवाल मैंने उठाया था उसका जबाब मुझे नहीं मिला। दरअसल इस सवाल का जबाब एक सवाल ही था और वो यह कि तुम पाना क्या चाहते हो? हमेशा कि तरह मेरा भाई मुझे समझ सका। उसने कहा कि मैं अपनी इच्छा (want) और जरूरत (need) के अन्तर को समझूं। मैने सोचना शुरु किया, सैकड़ों बातें जेहन को मथती रहीं। मंथन का परिणाम मिल गया अभी कह नहीं सकता लेकिन कुछ रास्ते जरूर दिखने लगे हैं। जिन्दगी कोई जटिल पहेली है, बड़ी मुश्किल से ये बात तो समझ आ गयी उम्मीद करता हूँ एक दिन ये पहेली भी सुलझा पाऊँगा। रहा सवाल मेरे पलायनवादी होने का तो साफ करता चलूँ ऐसा बिल्कुल नहीं है। मैं मशीन बनकर नहीं जीना चाहता इसीलिए जिन्दगी में मुश्किलें आ रही है। बस यूं ही किसी राह पर बढ़ चलना और जीत का गुमान रखना मुझसे नहीं हो सकता। मेरा यह फैसला मेरी आत्मा के हित में है, रहा सवाल शरीर का तो उसके लिए भी रास्ता ढूँढ रहे हैं। चार्ली चैप्लिन की फिल्म मॉडर्न टाइम याद आ रही है। भेंड़ों सी चलती भीड़ और मशीनों में पिसता आदमी। मैने पहले भी जिक्र किया था मेरी सारी समस्या दरअसल जीवन मूल्यों और जीविका-साधन के सन्तुलन की है, उम्मीद है इसे मैं जल्द सुलझा लूँगा। मैं अपने जीवन के आखिर में यह शेर बिल्कुल नहीं याद करना चाहूंगा।

कैसी नकली जिन्दगी पड़ी हमारे भाग
मन में वृन्दावन लिए जीते रहे प्रयाग।

Friday, December 25, 2009

वापसी

आज वापस जाने का टिकट बुक किया। 10 जनवरी 2010 की वापसी तय हुयी है। ऐसा पहली बार नहीं था कि मैं दिल्ली से बाहर जाने के लिए टिकट बुक कर रहा था, फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार किसी ने ये नहीं पूछा - वापस कब आओगे ? क्योंकी ये मेरी वापसी का टिकट था, शायद हमेशा के लिए वापसी। ज़ेहन में अजीब सी हलचल थी। देर तक कई तूफान गरजते रहे, कुछ बरसे भी। कोई कोना गीला हो उठा। करीब तीन साल पहले 4 मार्च 2007 को जब यहाँ के लिए चला था तब सपने में भी नहीं सोचा था कि किसी दिन यूं भी लौटना होगा। पर जिन्दगी का लुफ्त ही क्या कि जो सोचा वही हो भी जाए। जिन्दगी में सबसे बुरा होता है हमारे सारे सपनों का मर जाना, हमारी सारी उम्मीदों का खत्म हो जाना, बस यही किसी सूरत में नहीं होना चाहिए। जब मैं दिल्ली आया था तब मेरी आँखों में कुछ सपने थे, अपने अस्तित्व को लेकर कुछ संकल्प थे। ये संकल्प इतने दृढ़ थे कि मैंने अपने चारो तरफ डाली गयीं सारी भय आशंकाओं और आर्थिक असुरक्षा की परवाह ही नहीं की। एक अजीब सा जूनून और जोश था एक उम्मीद थी। अब मैं खुद में वो जोश तो नहीं पाता लेकिन अगर मैं जिन्दा हूँ तो इसलिए कि एक उम्मीद मुझमें अब भी कहीं जिन्दा है। ये वापसी प्रमुख रूप से मेरी आर्थिक विवशता और असुरक्षा की देन है। ज़िन्दगी में कभी- कभी दो कदम आगे बढ़ने के लिए एक कदम पीछे हटना पड़ता है। मुझे यकीन है ये वापसी बस कदम भर की है।

Saturday, December 5, 2009

न हाथ बाग पर है, न पांव रकाब पर

बहुत दिनों बाद लिख रहा हूँ। बीच में जरूर कोशिश की थी कि लिखूँ, पर लिख नहीं पाया। समय नहीं मिला ऐसा भी नहीं था, फिर भी कुछ लिख नहीं पाया। बीता समय जबर्दस्त अन्तर्द्वन्द्व, उलझन, तनाव, कुन्ठा और बेचैनी का समय था। अभी इन सब से मुक्त होने का दावा तो जल्दबाजी होगी, लेकिन इनका असर कुछ कम जरूर हो चला है। दर्द का हद से गुजरना है दवा बन जाना। लेकिन इस बीते समय की बेचैनी ने स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित किया है। मेरे लिए जीवन का उद्देश्य जीविका कमाना भले ही कभी भी न था, लेकिन अब जीविका के साधन के चयन और जीवन मूल्यों के बीच सन्तोषपूर्ण समन्वयन स्थापित कर पाना मेरे लिए अत्यन्त जटिल प्रक्रिया साबित हो रही है। जीवन में अर्थ ( धन ) के महत्व को पहली बार इतनी महत्वपूर्ण समझ आयी है। यहाँ हर चीज़ है बाज़ार में इस हाथ दे उस हाथ ले । जीवन में अभी तक लगातर मूल्यों की टुटन ने जो खाली जगह बनायी है उसे नये मूल्यों ने अभी भरा नहीं है। यह खालीपन भी बड़े झंझावात ला रहा है। पिछले कुछ ही दिनों मे ही मैने अपने जीवन का सबसे कठोर निर्णय स्वीकार कर लिया है। मैने अपने कुछ सपनों (शायद मेरी जिन्दगी के सबसे अज़ीज ख्वाब) के पूरा हो पाने की उम्मीद छोड़ दी है। ख्वाब तो खैर टूटते ही रहते हैं लेकिन सबसे बुरा होता है हमारी उम्मीदों का मर जाना। ये ख्वाब मुझे तोड़ भले ना पाए लेकिन मेरे अन्दर बहुत कुछ बदल जाने वाला जरूर है और यह बदलाव मेरे जीवन की दिशा और गति में असाधारण बदलाव होगा। किसी ने कहा “कहना आसान होता है “, मै चुप रहा, क्योंकी मुझे जबाब देना है। क्या यह सम्भव होगा ? अपनी हालात पर बशीर बद्र याद आ रहे हैं.

देने वाले ने दिया सब कुछ अजब अन्दाज़ में
सामने दुनिया पड़ी है और उठा सकते नहीं।

इकबाल का शेर भी कुछ अपनी हालात बयां कर रहा है -

रौ में है रक्से उम्र, देखिए कहाँ थमें
न हाथ बाग पर है, न पांव रकाब पर।

Wednesday, November 25, 2009

यायावरी

लोग कहते हैं मैं पलायनवादी हूँ और कुछ हद तक मैं हूँ भी। लेकिन मुझे यायावर शब्द अपने ज्यादा करीब लगता है। पिछले दिनों अपने तीन दिनों के हल्द्वानी प्रवास में मुझे यायावरी करने का मौका मिला और मैं निकल पड़ा छोटी हल्द्वानी की तरफ। समय सीमित था, लेकिन यायावरी चरम पर थी। 30 कि.मी. की यात्रा पहले बस से फिर लिफ्ट लेकर बाइक, ताँगे, और मिनीट्रक में पूरी की। मेरे लिए कहीं की यात्रा करना, उस वातावरण की आत्मा में प्रवेश करना होता है। इसके लिए मैं लोकल लोगों से ज्यादा से ज्यादा उनकी जिंदगी के बारे में बात करता हूँ, अधिक से अधिक पैदल चलकर प्रकृति को आत्मसात करने की कोशिश करता हूँ और लोकल फल, सब्जियों, अनाज, और व्यंजनों को उदरस्थ करता हूँ। इस यात्रा में यह सब पूरी शिद्दत से किया गया। पर्यटनस्थल के रूप में कार्बेट फाल और जिम कार्बेट के स्मारक भवन जो कभी जिम कार्बेट का निवास था की यात्राएं हुईं। जिम कार्बेट भारत में आदमखोर (man-eater) शेरों के शिकार और अपने शिकार करने के घटना-वर्णन के लिए विख्यात हैं। स्मृतियों के पुराने झरोंखों से झांकता हूं तो पाता हूँ, बचपन के दिन, गांव का घर, सबसे कोने के कमरे में लोहे के पुराने बक्से में मिली पुरानी किताब जिसमें रोंगटे कड़ी करती शेर की दहशत की दास्तान और अपने कुत्ते के साथ उस दहशत को खत्म करने के लिए शेर के पंजों की तलाश करता एक शिकारी। मैं अंदाजा लगा सकता हूं किताब का नाम था - मैनईटर्स आफ कुमाउं। मुझमें यायावरी का बीज बोने मे जिम कार्बेट की भी बड़ी भूमिका रही है। छोटा सा घर है जिम कार्बेट का, सोचता हूँ उनके समय पर भी तो कुछ लोग रहे ही होंगे जो दुनिया की सारे संसाधनों को हड़प कर जाना चाहते रहे होंगे। कार्बेट के हाथ से बनी कुर्सियां, मेज और दूसरे सामान देखता हूं और सोचता हूँ जिन्दगी को जीने के लिए आखिर चाहिए ही कितना होता है ?

मुझे सुकून घने जंगलों में मिलता है
मैं रास्तों से नहीं मंज़िलों से डरता हूं ।

Wednesday, November 18, 2009

पनीर काठी रोल Vs चिकन काठी रोल, उर्फ निरुलाज़

कभी आपने कल्पना किया है क्या कि आप पनीर खाएं और चिकन का स्वाद आए। किसी शोधरत वैज्ञानिक के लिए यह एक रोमांटिक ख्वाब हो सकता है और चिकन-प्रेमियों के मुंह में पानी लाने वाली रसीली कल्पना लेकिन आज यह मेरे लिए कुछ पलों की हकीकत बन गया। अचानक एक मुलाकात का कार्यक्रम बन गया मेरा, कश्मीरी-गेट था उस वक्त और वहाँ निरुला ही एक ऐसी जगह है जहाँ महानगरीय वातावरण की आपाधापी और भागमभाग के बीच आप थोड़ी देर बैठ सकते हैं। मैक्डी की तुलना में वहां सीटें आराम से मिल जाती हैं और हम पहले भी वहां मिल चुके थे इसलिए वहीं मिलना तय हुआ। दोपहर के वक्त और हल्की भूख में हमने काफी के साथ पहले से आजमाया हुआ पनीर काठी रोल आर्डर किया। थोड़ी देर हमारा आर्डर हमारे सामने था, ग्रीन मार्क्स के रैपर में लिपटा पनीर काठी रोल। ग्रीन मार्क्स का रैपर वेजीटेरियन इडिबल आइटम को कवर करने के लिए प्रयोग किया जाता है। खाना देख भूख अपने रंग दिखाने लगी मैने सामने वाले को आफ़र करते हुए आगाज़ किया। मै प्योर वेजीटेरियन नहीं हूँ लेकिन सामने बैठा शख्स पैदाइशी वेजीटेरियन था और तभी वो महान घटना घटित हो गयी। रोल को प्लेट में ही तोड़ कर मैंने जैसे ही पहला ग्रास मुंह में डाला प्लेट में रोल में से एक ब्राउन टुकड़ा छिटककर बाहर आ गया। पुराने लम्बे परिचय ने दिमाग की घण्टी जोर से बजायी, और मुंह से बोल फूटे ये तो चिकन है। सामने से प्रतिक्रिया मिली लेकिन रैपर तो ग्रीन मार्क्स वाला है। उपभोक्तावादी समाज में व्यक्ति से ज्यादा बाज़ार पर गहरी आस्था (अन्धी- आस्था) का प्रतीक यह वाक्य मैं शायद ही कभी भूल पाँऊ। खैर मैनेजर से लेकर रसोइया कोई भी ये मानने को तैयार नहीं था कि रोल में चिकन है। रसोइया तो बकायदा चिकन के टुकड़ों को दिखा कर बोल रहा था, ये पनीर ही तो है। खैर लम्बी तार्किक प्रक्रिया के बाद बाज़ार ने आखिरकार माना कि गलती हुयी है लेकिन अन्तिम दोष व्यक्ति पर ही आया। बाज़ार ने गलती को मानवीय भूल करार दिया। मुझे दुबारा पनीर काठी रोल सर्व किया गया और रिश्वत मिली एक और काफी। सामने से बार-बार एक ही वाक्य दुहराया जा रहा था – मेरा तो धर्म ही भ्रष्ट हो गया होता। बाज़ार ये सुन रहा है क्या ?

Friday, October 16, 2009

हकीकत

एंकर की पोस्ट का आडिशन देने के लिए
जब घर ( शेयर किया हुआ आधा कमरा) से निकलने के क्रम में
मैंने आइने में खुद को निहारा,
तो पाया
मंगनी के(owned) सूट-पैंट, टाई और जूते के नीचे
छुपायी गयी अपनी हकीकत को,
मटमैली सी बनियान और अंडरवीयर के साथ
फटे हुए पुराने मोजे(मैने जूते इन्हीं से साफ किए थे ) ।
लेकिन इसके पहले कि हकीकत का केवल एक ही पहलू दिखता
मैने महसूस किया मटमैली सी बनियान के नीचे
कुछ सपनों के लिए धड़कते दिल की उजास को,
और इन्ही सपनों के लिए चरैवेति – चरैवेति( अनरत चलते रहो) का अनुसरण करते
अपने मजबूत कदमों की आहट को।
फिर इन्हीं अहसासों के साथ सड़क पर निकल कर मैं भी भीड़ का एक हिस्सा बन गया।

Thursday, October 15, 2009

शिकायती सप्ताह

बीता सप्ताह शिकायतों का सप्ताह रहा। खास रूप से सम्बधों को लेकर। कुछ को मुझसे शिकायत थी, और उन्होंने sms करके ढेर सारी शिकायतें की। कुछ और को भी मुझसे शिकायत थी, और उन्होंने मुँह बनाकर कर ढेर सारी शिकायतें की। कुछ से मुझे भी शिकायत थी, और मैंने नाप तौल कर कम से कम शब्दों में ढेर सारी शिकायतें की। पर जब इन शिकायतों से जरा दूर हट कर इन्हें तटस्थ भाव से देखने की कोशिश की, तो पाया कि असल में इन शिकायतों के माध्यम से हम सबने अपने- अपने रिश्तों को टटोलने की कोशिश की, कि कहीं इस भागम भाग की दुनिया में उसका कोई रिश्ता कहीं गिरकर खो तो नहीं गया। और टटोलने के बाद हम उन्हीं जबाबों को सुनकर, जो हमें पहले से पता थे, सन्तुष्ट हो जाते हैं क्योंकी हमारे अहसास मे आ चुका होता है कि हमने कुछ खोया नहीं है। पर इन शिकायतों को बटोरते समय हम अक्सर पुरानी यादों के पोटली की गांठें खोल बैठते हैं। और ये यादें.... ये किसकी सगी। याद करने पर बीता हुआ सुख भी दुख देता है। किसी ने नये दीप जलाने की बात की है। पिछले दिनों कहीं पर ये कविता मिली अच्छी लगी इसलिए साथ कर ली।
You must remember this
A kiss is still a kiss
A sigh is just a sigh
the fundamental things apply
as time goes by...